लगता है मछली होकर भी डूब ना जाउ एक दिन!

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कि मै मछली एक महा सागर की, जिससे पता ना था सागर का अगला छोर,
रख दिया उसे ले जाकर काँच की नगरी मे, कह के की तुमसा ना कोई सुंदर और,
इठलाई शरमाई सुनकर के की मुझसा ना कोई प्यारा और,
लगी मटकाने अपनी आँखे देखकर सबकी और,

पर घबराई यह सोच की यह काँच की दुनिया कितनी छोटी है!
की तैरुन कैसे, की मेरे पंख भी खुल नही पाते है,
काई अजनबी देखने आते है, काँच पर उंगली से खटखटा के मुझे डरते है..
कुछ मेरे पास आकर, मुझे देख कर मुस्कुराते है, काई तो अजब गजब से चेहरे बनाते है.

दो दिन के लिए तो बड़ी प्यारी सी लगी यह दुनिया,
पर गुज़रते हुए वक़्त मई बंधन सी लगने लगी है,
अब, मेरी आँखे उस बड़े समंदर को ढूँढती है,
ढूँढती है अपनी सहेलियों को, खिल खिलाकर हँसने को,
हाथ पकड़ के ज़ूर से पूगडी करने को!
कहाँ गये वो दिन जब चाचा दूर तैर जाने पर कान पकड़ घर ले आते थे,
भले खुद कान खीचते, पर पापा की मार से बचाते थे.
कहाँ गये वो पुरुष मछलियाँ जो मुझे तंग करने मेरे पीछे पत्ती की पूच लगते थे,

की इस शीशे की दुनिया मे ढंग तो सब है, पर रंग कोई नई,
“ए काँच का सौदागर, मेरा मलिक क्यू बना बैठा है?
छोड़ दे मुझे वापिस उस समादर में जहाँ से ले आया था,
जाने दे मुझे वही जहाँ खुद को बड़ी मछली के बचके भागने में मज़ा आता था!
की लंबी तैराक के लिए तरस रहे है है ‘Fins’
लगता है मछली होकर भी डूब ना जाउ एक दिन!!”

(bare with the English to Hindi mistakes)

Ki mai machali ek maha sagar ki, jisse pata na tha sagar ka agala choor,
Rakh diya usse le jakar kaanch ki nagri mai, keh ke ki tumse na koi sundar aur,
Ithlayi sharmayi sunkar ke ki mujhsa na koi pyaara aur, lagi matkane apni ankhe dekhte sabki aur,

Par ghabrayi yeh soch ki yeh kanch ki duniya kitni choti hai!
Ki tairun kaise, ki mere pankh bhi khul nai pate hai,
Kayi ajnabi dekhne aate hai, kaanch par ungali se khatkhata ke mujhe darate hai..
Kuch mere paas aakar, mujhe dekh kar muskurate hai, kayi toh ajab gajab se chehare banate hai.

Do din ke liye toh badi pyaari si lagi yeh duniya, par gujarte hue waqt mai bandhan si lagne lagi hai
Ab, meri aankhe us bade samandar ko dhoondhti hai,
Dhoondhti hai apni saheliyon ko, khil khilakar hasne ko,
Haath pakad ke joor se pugadi karne ko!
Kahan gaye woh din jab chacha door tair jane par kaan pakad ghar le aate the,
Bhale khud kaan kheechte, par papa ki maar se bachate the.
Kahan gaye woh purush machliyan jo mujhe tang karne mere peeche patti ki pooch lagate the,

Ki is sheshe ki duniya mai dhang toh sab hai, par rang koi nai,
“Yeh kaanch ka saudagar, mera malik kyu bana baitha hai?”
Eh sudagar, chor de mujhe wapis us samadar pai jahan se le aaya tha,
Jane de mujhe wahi jahan khud ko badi machli ke bach ke bhagne mai maza aata tha
Ki lamgi tairak ke liye taras rahe hai hai ‘fins’
Lagta hai machli hokar bhi doob na jaun ek din!!

1 Comment

  1. माटी का पलंग मिला राख का बिछौना ।
    जिदंगी मिली कि जैसे कांच का खिलौना ।
    एक ही दुकान में सजे हैँ सब खिलौने।
    खोटे-खरे, भले-बुरे, सांवरे सलोने ।
    कुछ दिन तक दिखे सभी सुंदर चमकीले ।
    उडे रंग, तिरे अंग, हो गये घिनौने ।
    जैसे-जैसे बड़ा हुआ होता गया बौना ।
    जिंदगी मिली कि जैसे कांच का खिलौना ।

    मौन को अधर मिले अधरों को वाणी ।
    प्राणों को पीर मिली पीर की कहानी ।
    मूठ बांध आये चले ले खुली हथेली ।
    पांव को डगर मिली वह भी आनी जानी ।
    मन को मिला है यायावर मॄग-छौना ।
    जिंदगी मिली कि जैसे कांच का खिलौना ।