• poem
  • लगता है मछली होकर भी डूब ना जाउ एक दिन!

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    कि मै मछली एक महा सागर की, जिससे पता ना था सागर का अगला छोर, रख दिया उसे ले जाकर काँच की नगरी मे, कह के की तुमसा ना कोई सुंदर और, इठलाई शरमाई सुनकर के की मुझसा ना कोई प्यारा और, लगी मटकाने अपनी आँखे देखकर सबकी और, पर घबराई यह सोच की यह […]